संदेश

मन क्या है ?

 मन बहुत ही सूक्ष्म जड़ पदार्थ या 'तत्व' से बना है | जाल की तरह, यह शरीर में फैला होता है और इसके तंतु इन्द्रियों में बुरी तरह धसें होते हैं और इन्द्रियों के द्वारा काम करते हैं | इसका आधार बहुत उपर होता है, चिदाकाश से जुड़ा हुआ है | यह भौतिक शरीर और चेतन आत्मा के बीच एक कड़ी का काम करता है | यह आत्मा है, जो मन और शरीर, दोनों को जीवन देती है | आग के जैसे, मन एक अच्छा नौकर है, पर एक बुरा मालिक |

हमारे पिछले जन्म हमसे क्यों छिपाए जाते हैं ?

 इसका एक महत्व है | पूरी इंसानी जिन्दगी कर्मों के अटल विधान पर आधारित एक नाटक है, जिसमें आत्माएं अपना आपसी लेन-देन चुकाने के लिए मिलती और बिछुड़ती हैं | अगर हमें कर्मों के इन कर्जों की जानकारी हो और हमें पता हो कि हम अपने यहाँ जन्में पुत्र-पुत्रियों के सिर्फ पुराने कर्जदार हैं, तो उनके पालन-पोषण के पीछे छुपी भावना पर बुरा असर पड़ेगा | यह काल भगवन के मुख्य कार्यों में से एक है कि इन सच्चाइयों को इन्सान से छुपा कर रखा जाए, ताकि जमीन पर जिन्दगी कायम रहे | आपकी शायद यह जानकर आश्चर्य होगा कि काल ने प्रभु से तीन ख़ास वरदान पाएं है | ये हैं : 1. किसी को भी अपनी पुरानी जिन्दगी की जानकारी न हों, 2. किसी को भी अपनी मौत का सही समय और दिन का ज्ञान न हो ; 3. जिन्दा गुरु इंसानों को चमत्कार दिखा कर पवित्र नामदान के लिए आकर्षित न करें, बल्कि सिर्फ सत्संग करे और अगर लोग अपने आप आएं और मन्त्र चाहें, तभी उनको नामदान दिया जाए |

एक सच्चे सत्गुरू की क्या पहचान है ?

  एक सच्चा सत्गुरु रूहों को परमपिता के सच्चे घर ले जाने के कार्य में लगा होता है | एक सच्चा सत्गुरु  सिद्धांत ही नहीं बताता है , वह अपने शिष्यों को जाती या निजी अनुभव भी देता है | वह प्रभु को जानने का और पाने का रास्ता दिखाता है, जो कि अंतर में है | यह प्रश्न प्रभु के हर सच्चे जिज्ञासु को आमतौर से परेशान करता है | में इस डर से किसी भी गुरु के पास जाने की हिम्मत नहीं करता था कि कहीं मुझे अधुरा गुरु न मिल जाए और मेरा सारा जीवन बर्बाद न हो जाए | अत: मैंने, प्रभु से मार्गदर्शन के लिए सच्ची प्रार्थना की | मेरी प्रार्थना सुनी गई |  एक सच्चे सत्गुरु  का कोई भी बाहरी स्वार्थ नहीं होता | वह अपनी मेहनत की कमाई पर गुजारा करता है | वह बाहरी दिखावे और सजावट को पसंद न करता हो| वह एक सादी जिन्दगी जिएगा और उसके विचार शुद्ध होंगे | उसकी असली योग्यता इस बात में है कि वह भक्त की अंतर की आँख और कान खोलकर, उसे प्रभु की ज्योति और प्रभु की वाणी का कुछ जाती अनुभव दे सकता है | इस अनुभव की मात्रा निर्भर करेगी, शिष्य की पृष्ठभूमि पर और उसकी ग्र्हण शीलता पर |

ध्यानाभ्यास के समय निद्रा से कैसे बच सकते है ?

 ध्यानाभ्यास के सम्स्य नींद से बचा जा सकता है, अगर आप, जो कुछ भी अंतर में दिखाई दे, उसके बीच में आंतरिक दृष्टि को लगातार एक जगह टीकाएँ और मन्त्रों का मन ही मन जाप करें, बहुत धीरे-धीरे, चाहे रुक-रुककर, ताकि आंतरिक दृष्टि में कोई विघ्न न हो | नींद या भटके हुए विचार तभी आते हैं जब आंतरिक दृष्टि या ध्यान अस्थिर हो जाए और इसके लिए काफी कठिन प्रयास की जरूरत होती है, ताकि ध्यानाभ्यास के समय पूरी तरह जागृत और चेतन बने रहने की आदत का विकास हो सके | वास्तविकता यह है की जब आप पूरी तरह ध्यानाभ्यास  में लगे होते हैं, तो चेतना अपने ठिकाने पर एकत्रित हो जाती है, जो कि आँखों के पीछे है | स्वप्न वाली निद्रा के दौरान आत्मा कंठ चक्र पर उतर आती है और गहरी नींद के समय यह नाभि चक्र तक आ जाती है | ध्यानाभ्यास  के समय शरीर सोता है, पर आत्मा चेतन रहती है और उच्चतर मंडलों में प्रवेश करती है  तथा चेतन रहकर इस उड़ान का आनन्द उठती है | पहली हालत को स्वप्न और दूसरी को विज़न कहते हैं | स्वप्न में आपको जो कुछ दिखें, उसकी आपको सिर्फ एक धुंधली सी याद रहती है, पर विज़न में ऐसा नहीं होता | पैगम्बर मोहम्मद...

यौगिक निद्रा क्या है ?

 यौगिक ऐसी निद्रा है, जसमें आत्मा निचले चक्रों में उतर जाती है और गहरी निद्रा में पहुँच जाती है और कभी-कभी सपने देखती है | यह किसी विचार पर ध्यान टिकने से आती है |

लोग कहते हैं कि वे सत्य की खोज में हैं या वे सत्य को पा चुके हैं | इसमें 'सत्य' के क्या अर्थ है ?

  महापुरुषों की शिक्षाओं के अनुसार 'सत्य' एक विज्ञानं है | इसे 'नाम' या 'शब्द' कहते हैं | इसका एक व्यवहारिक पक्ष है | यह सार्वभौमिक है और पूरी मानव जाति के लिए है | यह जीवनकाल में तय किया जाने वाला, प्रभु तक जाने का प्राकृतिक रास्ता है | यह आत्म-विश्लेषण और आत्म-निरिक्षण का तरीका है, जिसमें सत्गुरु द्वारा नामदान के समय, लोगों को व्यक्तिगत रुप से या समूह में, उनकी अंतर की आँख और कान खोलकर, उन्हें प्रभु की ज्योति और प्रभु की वाणी या श्रवणीय जीवनधारा से जोड़ दिया जाता है | इस अनुभव की मात्रा इंसान की ग्रहणशीलता और उसकी पृष्ठभूमि पर निर्भर करती है | शिष्य को प्रेम और श्रद्धा से, नियमपूर्वक, रोजाना समय देकर इसे अवश्य बढ़ाना चाहिए | 

क्या मरने से पहले हमारे लिए उन सबको माफ़ करना जरुरी है, जिन्होंने हमारे साथ ज्यादती की हो ?

 हमें 'माफ़ करो और भूल जाओ' का सिद्धांत सीखना चाहिए, जो कि शांति और सौहार्द पाने के लिए जीवन का एक सुनहरी नियम है | यह ध्यान टिकाने में बहुत सहायक होता है और इससे सफल ध्यानाभ्यास का वरदान मिलता है | जो माफ़ करता है, वह बहुत धन्य है | बदला लेना कायरता है, पर दूसरों की गलतियों को माफ़ करना सदाचार का कार्य है | सभी को सलाह  है कि सोने से पहले वे अपने कर्मों का जायजा लें कि दिन में काम करते समय, क्या उन्होंने किसी को नाखुश किया है या किसी के साथ नाइंसाफी की है | यदि ऐसा है, तो वे पछतावा करें और दिव्य दया के लिए प्रार्थना करें | इस प्रकार अगर दूसरों ने, एक या दुसरे तरीकें से नुकसान पहुँचाया है तो उन्हें माफ़ क्र देना चाहिए | बाइबिल में एक बहुत अच्छा उदहारण है, जिसमें यह कहा जाता है कि जब कोई प्रार्थना में खड़ा हो, तो उससे पहले वह अपने उन भाइयों की कमियों या गलतियों को माफ़ कर दे, जिन्होंने उसके साथ ज्यादती की थी, ताकि स्वर्ग में बैठा पिता भी उसकी कमियों को माफ़ कर दे | स्पष्ट है, हमें अवश्य ही अपनी दैनिक जिन्दगी में ऐसी क्षमा भावना का विकास करना होगा | हमें अवश्य ही, इस मृत्युलोक को छोड़ने...