लोग कहते हैं कि वे सत्य की खोज में हैं या वे सत्य को पा चुके हैं | इसमें 'सत्य' के क्या अर्थ है ?

 महापुरुषों की शिक्षाओं के अनुसार 'सत्य' एक विज्ञानं है | इसे 'नाम' या 'शब्द' कहते हैं | इसका एक व्यवहारिक पक्ष है | यह सार्वभौमिक है और पूरी मानव जाति के लिए है | यह जीवनकाल में तय किया जाने वाला, प्रभु तक जाने का प्राकृतिक रास्ता है | यह आत्म-विश्लेषण और आत्म-निरिक्षण का तरीका है, जिसमें सत्गुरु द्वारा नामदान के समय, लोगों को व्यक्तिगत रुप से या समूह में, उनकी अंतर की आँख और कान खोलकर, उन्हें प्रभु की ज्योति और प्रभु की वाणी या श्रवणीय जीवनधारा से जोड़ दिया जाता है | इस अनुभव की मात्रा इंसान की ग्रहणशीलता और उसकी पृष्ठभूमि पर निर्भर करती है | शिष्य को प्रेम और श्रद्धा से, नियमपूर्वक, रोजाना समय देकर इसे अवश्य बढ़ाना चाहिए | 

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